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शनिवार, 18 फरवरी 2012


मेहेरबाबा की गुजरती आरती का हिंदी अनुवाद :--

बुझा दे आग अज्ञानी, प्रकृति को हुक्म  दो बाबा !
है भक्तों की लगी आशा, की दोगे रौशनी बाबा !!

मेरे सदगुरू मेहेरबाबा , नमन है तेरे चरणों में !
खुदाई ज्ञान है तुमको, औ उसमें बस रहे बाबा !!

तुम्ही हो सत्य के स्वामी, तुम्ही प्रिय हो औ प्रियतम भी !
तुम्ही आध्यात्म की धारा , जलधि एकत्व के बाबा !!

अरे सद्गुगुरु मुरीदों को , बकश दो ज्ञान ईश्वर का !
तुम्ही परमात्म के ज्ञानी, औ मालिक सत्य के बाबा !!

प्रभो का प्रेम पी कर मस्त हो जीवन निछावर यह !
की प्याला दिव्य भर दे साक़िया बनकर मेहेरबाबा !!

हमारी नाव भवसागर के बीचोबीच में अटकी !
तुम्ही हो नाव नाविक औ निगहबा सब मेहेरबाबा !!
--------------------------------------------------------देहरादून, २२ मार्च २००३.

बृहस्पतिवार, 16 फरवरी 2012

दो कवितायेँ


एक उनीस वर्षीय लड़की पहली  बार प्यार कर बैठी. उसका तो वो पहला प्यार था लेकिन उसके प्रियतम की उम्र उससे दस साल अधिक थी. मैं इस व्यापार का निर्लिप्त द्रष्टा रहा था. उसी को लक्षय करके इन कविताओं की रचना विभिन्न कालखंडों में हुई थी. शायद पसंद आये ----

१. १९८५ 
प्रस्ताव 
नन्हे नन्हे मनो में नन्ही नन्ही खुशियाँ!
किस अनुभूति में मुडी मुडी अखियाँ !!

किसी को लुभाने का तुम्हारा ये प्रयास !
जैसे खड़ा हो बचपन आसपास !! 

छोटी सी तुम छोटी सी दुनियाँ !
जैसे बंद पिजरे में चहके ललमुनिया !!

ककहरा जीवन का प्यारी तू सीख !
'' से पेट औ '' से भीख !!

'' से याचना लेकिन '' से हक !
छोटी सी जिंदगी सोचें कहाँ तक !!

फूल सा कलेवर कली  सा दिल !
कैसे खिलेगे दिल सूचें आज मिल !!

२. १९९७ 
पुनरावलोकन 

और क्या चाहिए !
धन्यवाद !
न भूलने के लिए
साधुवाद, ललमुनिया को,
अपनी दुनिया बनाने के लिए!!

मुड़कर पुकारने के लिए
फिर धन्यवाद;
लायी है रंग 
तुम्हारी वफ़ा
मिल गया है तुम्हे कोई मुस्तफा,
और क्या चाहिए !

जी भुलाने को --
जीत जाने को --
जीते जाने को --
और क्या चाहिए,
जब हो कोई मुड़कर बुलाने को तो,
और क्या चाहिए !!

रुके रहना  कहने को-
रौब्दारी ज़माने को--
बदजबानी को--
खता करने को-
इन सबके तस्सवुर में
साथ साथ बहने को-
सबको धन्यवाद कहने के सिवा
और क्या चाहिए !! 

लेकिन नज़रें भी हैं , सीन अनसीन भी हैं,
नज़रों की नसरीन भी हैं!
चके गरेबाँ भी हैं 
हर ज़मीन के आगे आसमां भी हैं !!

तेरी हिम्मत, तेरी फितरत;
तेरा प्यार करनाफिर रूठे ही रहना-
धुल को भी, पसीना बना के पीना-
और उसमें से भी सिफ 'अच्छे' से मतलब,
तेरी ज़हीनत, तेरी वाह लियाकत,
जो अब भी छुपी है
उसे दिया बाती बना कर जलाना
अगर उसके जलने से रोशन ये जहाँ हो,
 तो कैसे सितारे, और उसके आगे कैसे जहाँ हो !!

यही मेरे फिकरे तरन्नुम के  बिना भी गुदगुदाये
और उसपे हँसी आये, तो -
ऐसी हंसी के सिवाए और क्या चाहिए !!

-----------------------------------------------------जून ६, १९९७, फैजाबाद, उ. प्र.

बृहस्पतिवार, 3 जून 2010

अमर तिथि 2009

मानव रूप में इश्वर को अवतार कहते हैं मानव जन्म लेता है और मरता है ऐसे ही आधुनिक युग के अवतार  "मेहेर बाबा" हैं जिनकी पुण्यतिथि को "अमर तिथि" कहते हैं बाबा ने कहा था की अवतार के धरती पर आने के बाद ७०० से १४०० साल में उसके उपदेशों की   रूढी   बन जाती है  -- विकृति जाती है Check Spelling

अमर तिथि २००९
(१)
चलीसवे अमर तिथि में
 भीड़ बढ़कर पचीस हज़ार हो गई,
हले के "चोज़ेन-फियू" के
मन का "उत्स"
"मोब" का "उत्सव" बन
पसर गई।
-----
हृदय का द्वार खुला रह गया,
 अनुभूति की जगह
चेतना में खोपडी (मस्तिष्क) के रास्ते
अनुभव घुस गया;
जैसे आपके आने का "काउंट डाउन"
शुरू हो गया
------
आपके जाने के बाद, "आरनगौव" हुआ "मेहेराबाद"
अब आपकी याद आती हैं  जैसे
ट्रेन गुज़र जाने के बाद,
 रेल कि पटरियां थरथराती हैं
--------------
आपके ही बताया था --
'याद' पहले 'इबादत'
फिर 'आदत'और फिर 'रस्म' बन जायेगी,
जैसे पटरियों की थरथराहट
धीरे ध्रीरे
बीती बात हो जायेगी.
----फिर आना, और  जाना
धरम की एक और विधि बन जाएगी
सीखना या जागना कौन चाहेगा --
बस अमरतिथि रह जाएगी !
-------
(२)
दो साल पहले आया था (मैं)
अमरतिथि का स्टेज प्रोग्राम बड़ा भाया था --
भजनों, ग़ज़लों. गीतों और नाटकों को देख
गला भर आया था आह !
वाह पी पी पी  ट्रस्ट वाह !!
-----------
दर्शन की लाइन में खड़े खड़े
क्लोज़ सर्किट टेलिविज़न पर
आप की समाधि दिखती रहती थी --
गीत - ग़ज़ल नामधुन नेपथ्य में
आपकी छवि और याद मन में !
सटीक लगता था
आने का और स्टेज प्रोग्राम का उद्देश्य --
समाधि में आप को नमन प्रमुख,
गीत-ग़ज़ल घलुए में.
पर
सात सौ की कौन कहे
चालीसवें वर्ष से ही
प्रतीत होता है
गीत भजन श्रवण सुख प्रमुख--
आपको नमन घलुए में !!
 ----------
क्लोज सर्किट कैमरे का मुख क्यों मोड़ दिया ?
अमरतिथि का फोकस क्यों छोड़  दिया ?
धीरे ध्रीरे रस्मोरिवाज बनती अमरतिथि !
इतिहासों का इतिहास बनती अमरतिथि !!

------------------------------------------------- मेहेराबाद, अहमदनगर (महाराष्ट्र)
                                                               ऍम ० पी ० आर ०  R  No   M - ११८
                                                              ३१ जनवरी , २००९










शनिवार, 15 मई 2010

ब्लॉगिंग

नई ताज़ी रचना पढ़ें और जो मन में आवे करें , कौन है यहाँ जो बोर होकर अंडें फेकेगा ?


तुम्हारा घर तुम्हारा  ब्लॉग,


मेरा घर मेरा ब्लॉग !


तुम मेरे घर आओ


मैं तुम्हारे घर आवउ


तुम मेरे पिछलग्गू (फालोअर) बनू


मैं तुम्हारा पिछलग्गू बनूँ;


यानि तुम मेरी पीठ खुजाओ 


मैं तुम्हारी पीठ खुजाऊँ !


ब्लॉगर ब्लॉगर भाई भाई 


ट्विटर ब्लॉगर लिंक बनाई !! 




--------------- सफरचंद , बस्ती , १६ मई २०१० 

सोमवार, 1 मार्च 2010

Happy Birthday to my wife Pushpa

संयोग वश इस बार (१ मार्च २०१०) को पुष्पा का जन्म दिन और होली एक साथ पड़  गए.
ब्लॉग पर  फटी पुरानी नोटबुकों  में अपने  लिखे अक्षर पोस्ट करने  और "होली-मन"  से नेट जगत से गले मिलने प्रस्तुत है ...................................................................................................
बधाई

उन्नीस से उनतीस,
तीस से पचास,
पचास से सडसठ -
रे मन अब तो छोड़  दे 
सब कुछ  बदल जाने का हठ !
क्यों कि उन्नीस से सडसठ तक
उम्र क़ी सरिता जो बही है,
उसके हर बदलाव में -
मन तो वही है !!
एक साल और बीता,
बीस बार खांसी का दौरा आया,
चार बार बुखार - हड्डी का दर्द ,
मैले कपड़ों क़ी गर्द --
साफ़ करते करते, सहते सहते 
ज़र्द खून हुआ और सर्द ! 
इन यातनाओं क़ी दुहाई दूँ ,
या प्रिये ! तुमको बधाई  दूँ ?  
 दुहाई नहीं बधाई;
कष्ट होने क़ी नहीं,
उसे सह जाने क़ी बधाई.
 जीवन पथ पर यात्रा का
एक पड़ाव गुजरा है;
जहां से कोई नहीं, गुज़रा -
हमारा कारवां वहाँ से गुजरा है !
यात्रा का आनंद तो है पर,
आनंद क़ी यात्रा अभी कहाँ है ?
बूँद से बादल, बादल से वर्षा
वर्षा के बूँद का सागर जहां है !!
थकान को पीछे छोड़
जीवन क़ी यात्रा अभी बाकि है --
जीवन से मृत्यु क़ी ओर नहीं
इस जन्म से उस जन्म तक
जीव क़ी यात्रा अभी बाकि है !
कौन जाने कब कौन
जन्मान्तर पथ का सैदाई  है !!
मैं हूँ या तुम
साकी के वेश में
पुनर्जन्मों के देश में, अतः
तुम्हारी मुझको
और मेरी तुमको
बधाई है !!!!
------------------------------------------- पुष्पा को -- लखनऊ, १ मार्च २००८.

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

सोनचिरैया

सुनते हैं कि हिन्दुस्तान को "सोने की चिड़िया" कहा जाता था. देसी भाषा में "सोने की चिड़िया" को "सोनचिरैया"
कहने कि परम्परा है.  इसी सोनचिरैया के बारे में कुछ लाइनें कभी लिखीं थीं. देखें : ----------

फांसी पर लटके शहीद, गोली खाए महात्मा,
मरने  मिटने का जब होता है परिवेश --
तब बनता है एक देश.
भूगोल बनता है तन;
जनगण बनता है मन.
अज्ञात अतीत से बनता है आस पास
मन में प्रस्फुटित हो रचता है इतिहास ----
००००
सोनचिरैया (देश)
चंचल मन का
प्रवाहित जल,
अतीत की शिला से
फिसलता हुआ --
कल्लोल करता हुआ --
काव्य कल्पनाओं और
वैदिक ऋचाओं को
जगाता हुआ --
०००
 भविष्य का ढलान
जब तक मिला
मन प्रवाहित रहा --
अंतर धोता रहा --
मनु पुत्र बीज बोता रहा --
कल्पना सजाता रहा --
०००
धीरे धीरे,
बनी एक पुष्करिणी !
एक तीर्थ !
जातियां आती रहीं --
सद्यस्नाता कल्पना
तीर्थस्थान से
परलोक संवांरती रहीं --
०००
तालाब का ठहरा पानी
जल्कुम्हियाँ ढँक लेतीं हैं --
अब:-
मछली मारने जैसी बदबू
सुबह-शाम आती है,
मेरी सोंन-चिरैया !
जब तेरी याद आती है !!
०००
----------------------वाराणसी २६ जनवरी, 1989